कैसे पता चले कि डिलीवरी कौन सी करवाएँ- नार्मल, सिजेरियन और वाटर बर्थ

नार्मल डिलीवरी – फायदे और परेशानियाँ :

जब किसी गर्भवती महिला को कोई भी शारीरिक परेशानी जैसे बीपी बढ़ना या सांस ऊपर – नीचे होना जैसी नहीं होती तो बच्चा औरत की योनि में से बाहर निकलता है इसे ही नॉर्मल डिलीवरी कहते है ।

फायदे :

  • नार्मल डिलीवरी के तुरंत बाद एक माँ अपने बच्चे को स्तनपान करवा सकती है ।
  • नार्मल डिलीवरी से जन्म लेने वाले बच्चों को साँस की तकलीफ होने की संभावना बहुत कम होती है ।
  • नार्मल डिलीवरी से महिला को 1-2दिन में छुट्टी मिल जाती है
  • नार्मल डिलीवरी की दर्द सहने के बाद औरत को किसी भी प्रकार की दर्द नही होती ।

नुकसान :

  • नार्मल डिलीवरी से एक औरत को पाइल्स होने का खतरा बना रहता है ।
  • योनि से बच्चा बाहर निकलते वक़्त संक्रमित भी हो सकता है ।
  • कई बार बच्चा निकलने में देर हो जाए तो बच्चे को कोई तकलीफ भी हो सकती है ।

सिजेरियन डिलीवरी फायदे और परेशानियाँ :

जब बच्चे को माँ का पेट चीर कर बीच मे से निकाला जाता है तो उसे ही सिजेरियन या ‘सी सेक्शन’ डिलीवरी कहते है ।

फायदे :

  • इसमें औरत को लेबर पेन नहीं झेलना पड़ता ।
  • उसे पहले से हॉस्पिटल की तैयारी के लिए वक़्त मिल जाता है ।
  • योनि से संक्रमण की आशंका कम हो जाती है ।
  • बच्चे को किसी भी प्रकार की कोई भी समस्या नही झेलनी पड़ती ।

नुकसान :

  • सिजेरियन डिलीवरी से कई बार बच्चे को  दमा होने का खतरा रहता है ।
  • इससे औरत को बाद में ज़्यादा आराम पर  ध्यान देने की जरूरत होती है ।
  • उसे हॉस्पीटल से भी ५-६ दिनों के बाद डिस्चार्ज किया जाता है ।
  • अगर एक औरत के टांके अंदर टूट जाये तो उसे  बहुत  ज़्यादा कष्ट झेलना पड़ता है ।
  • एक औरत को सी सेक्शन के बाद कई दिनों तक उठने -बैठने में दिक्कत महसूस होती है ।
  • कई बार पेट चीरते समय कट बच्चे को भी लग सकता है ।

वाटर बर्थ :

आजतक आपने नार्मल या सिजेरियन डिलीवरी के बारे में सुना होगा। आजकल एक नई तकनीक आई है जिसे वाटर बर्थ तकनीक कहते है। इस में एक गर्भवती महिला को पानी के टब के अंदर बिठाया जाता है । यह गुनगुना पानी होता है और उसमें उसकी डिलीवरी की जाती है । ऐसी डिलीवरी या तो आप अपनी मर्ज़ी से करवा सकती है या फिर ज़्यादा कॉम्प्लीकेशन्स होने पर भी डाॅकटर ऐसा करने को कहते है। 

फायदे :

  • सबसे पहले तो गर्भवती औरत को वाटर टब में आराम मिलता है। उसे काफ़ी हद तक संकुचन से राहत मिलती है ।
  • गर्भवती औरत को भार से सपोर्ट मिलता है और वह आसानी से मूवमेंट्स कर  सकती है ।
  • गर्भवती की युटरस की मसल्स भी ठीक रहती  है ।
  • इससे ब्लॅड सर्कुलेशन भी ठीक रहता है ।
  • यह बीपी को भी नार्मल रखने में सहायक होता है ।
  • यह तनाव को भी बैलेंस करता है ।
  • महिला को डिलीवरी से डर भी कम लगता है ।

नुकसान :

  • सबसे पहले तो बच्चे  के बाहर आते ही अम्बिलिकल कॉर्ड को नुकसान हो सकता है ।
  • बाहर आकर साँस लेने से उसके अदंर पानी जाने का खतरा बना रहता है ।
  • इससे बच्चे का शारीरिक तापमान ऊपर – नीचे हो सकता है ।
  • बच्चे को कई बार पानी से कोई और तकलीफ भी हो सकती है ।

वाटर बर्थ लेते समय ध्यान रखे इन बातों का :

  • लेबर पेन शुरु होने पर ही जाए वाटर बाथ टब में ।
  • अपने साथ एक एक्सपर्ट और एक पार्टनर को जरूर ले कर जाएं ।
  • अगर गर्भ  में बच्चे जुड़वाँ या अधिक हो तो वाटर बर्थ की सलाह नहीं दी जाती ।
  • अगर गर्भवती की योनि से अधिक खून निकलने लगे तो भी यह टेक्नीक नहीं अपनानी चाहिये ।
  • अगर गर्भवती को 100.4°से अधिक बुखार हो तो भी इस तरीके से डिलीवरी नहीं करवानी चाहिए ।
  • अगर बच्चा बीच में  हो और उसे कोई भी परेशानी होने का आभास हो तो भी यह तकनीक नहीं लेनी चाहिए ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back To Top